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ईवीएम से निकलने वाले परिणाम संसदीय लोकतंत्र के लिए गंभीर मंथन का विषय:हरीश रावत

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कॉन्ग्रेस के कद्दवार नेता और पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत ने एक्जिट पोल को लेकर एक लंबी पोस्ट सोशल मीडिया पर पोस्ट की है जिसमे उन्होने एक्जिट पोल के दावों पर  सवाल उठाते हुए कहा कि हर बार जितनी सीटे एक्जिट पोल बीजेपी के लिए बताते हैं उतनी ही सीटे बीजेपी जीतती है ये कैसे संभव है ? अपनी फेसबुक वाल पर पूर्व मुख्यमंत्री ने लिखा है

“जैसे ही कल शाम सूचना मिली कि कांग्रेस पार्टी #एग्जिट_पोल को लेकर हो रही मीडिया बहसों में भाग नहीं लेगी, तो मन में कुछ खटका! लेकिन मैंने फिर मंथन किया कि क्यों हम इस निष्कर्ष पर पहुंचे तो मुझे स्मरण आया 2017 के विधानसभा चुनाव का, उस चुनाव में भाजपा के नेताओं ने प्रारंभ से ही जितनी सीटें जीतने के दावे किए थे, एग्जिट पोल में भी वही संख्या दोहराई गई, तो मेरे मन ने सोचा कि भाजपा का प्री एग्जिट पोल भी उतना ही सटीक है जितना एग्जिट पोल का और फिर उसके बाद पोल का निष्कर्ष! फिर मुझे स्मरण आया 2022 के चुनाव का, चुनाव प्रारंभ होते ही भाजपा के नेतागणों ने जीती जाने वाली सीटों की संख्या और मेरी चुनावी हार का मार्जन भी काफी पहले घोषित कर दिया, एग्जिट पोल ने भी कमोवेश उसी संख्या को बताया। हां एक सरप्राइज 2017 में और 2022 में भी देखने को मिला। 2017 में भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष और सीएलपी के नेता पार्टी को तो भारी बहुमत से विजयी बना देते हैं, मगर स्वयं चुनाव हार जाते हैं। 2022 में भी जिस व्यक्ति के चेहरे पर राज्य में चुनाव लड़ा जाता है जिसको भाजपा के तारणहार के रूप में प्रस्तुत किया जाता है और वह स्वयं चुनाव हार जाते हैं और पार्टी बड़ी संख्या के साथ चुनाव जीत जाती है। एक और संयोग मुझे स्मरण आया कि दोनों लोगों ने यह कहा कि चुनाव हारने के बाद उन्हें मोदी जी और अमित शाह जी के टेलीफोन आए और उन्होंने कहा कि चिंता मत करो, तुमने काफी मेहनत की है तुम्हें पुरस्कार मिलेगा और दोनों को पुरस्कार मिला। एग्जिट पोल से जुड़े हुए जो व्यक्तित्व हैं मैं उनका बड़ा सम्मान करता हूं। मगर मैं इस बात का उत्तर नहीं ढूंढ़ पा रहा हूं कि भाजपा महीनों पहले जितनी सीटें जीतने का दावा करती है, एग्जिट पोल और उसके बाद EVM भी उनके दावों की पुष्टि करती है! क्या देश का जनमत पूरी तरीके से भाजपामय है कि वह जितनी संख्या बताएं, लोग उतनी संख्या पर मोहर लगा दें? यदि वास्तव में चुनाव प्रक्रिया होती है, पक्ष-विपक्ष है, घोषणा पत्र जारी होते हैं, बड़ी-बड़ी रैलीज, पदयात्राएं और रोड शो आयोजित होते हैं, क्या यह सब जनता को लेस मात्र भी प्रभावित नहीं कर पाते हैं? संख्या को लेकर भाजपा के दावे, उनको वैधानिकता देता हुआ एग्जिट पोल व EVM से निकलने वाले परिणाम संसदीय लोकतंत्र के लिए एक गंभीर मंथन का विषय बनते जा रहे हैं। आज का चुनाव केवल चुनावी जीत और हार का प्रश्न नहीं है, बल्कि लोकतांत्रिक प्रणाली की जीत-हार पर भी चुनावी निष्कर्ष गहरे व दीर्घकालिक प्रभाव डालेंगे।

 

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