20.3 C
Dehradun

देवेंद्र प्रसाद: बच गया हजारों लोगों का आशियाना, देश को ज़रूरत है ऐसे न्यायधीशो की जो देखें मानवीय दृष्टिकोण को भी

Must read

हल्द्वानी के वनभूलपुरा मे रेलवे कि दावे वाली 29 एकड़ जमीन से अतिक्रमण हटाने के उत्तराखंड उच्च न्यायालय के आदेश के बाद पूरे देश में उच्च न्यायालय के आदेश को लेकर एक बहस छिड़ गई थी कुछ लोग जहां रेलवे के पक्ष में बोल रहे थे वहीं कुछ लोग वहां रह रहे परिवारों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़े थे। उत्तराखंड हाई कोर्ट के आदेश के बाद इस इलाके में रह रहे लोगों की उम्मीदें जैसे सुन पड़ चुकी थी लेकिन एक उम्मीद की किरण देश का न्याय का मंदिर कहीं जाने वाली सुप्रीम कोर्ट पर थी ।

सुप्रीम कोर्ट पर यह मामला जब गया तो इस पूरे मामले को लेकर लोग अपनी-अपनी तरीके से कयास लगा रहे थे लेकिन जैसे ही सुप्रीम कोर्ट ने अपना निर्णय सुनाया तो कई हजार हाथ दुआओं के लिए खड़े हो गए और उनके मुंह से एक आवाज निकली हिंदुस्तान जिंदाबाद ,खुदा तेरा शुक्र है ये वो लोग थे जो शायद पूरी रात सो नहीं पाए थे जिनको शायद नीद नही आ रही थी क्योंकि उनका आशियाना उजड़ रहा था जिस आशियाने को उन्होने तिनके तिनके से बनाया था। इन लोगो को समझ नहीं आ रहा था कि अपने आशियाने को बचाने के लिए क्या करें लेकिन हजारों लोगों की दुआएं काम आ गई और सुप्रीम कोर्ट ने अपने निर्णय को देते हुए कहा कि 50000 लोगों को रातों-रात हटाया नहीं जा सकता इस विवाद का एक व्यवहारिक समाधान खोजने की जरूरत है सरकार उनके पुनर्वास का प्रबंध करें तब उनसे जमीन खाली करवाई जाए।
शीर्ष अदालत ने साथ ही रेलवे और उत्तराखंड सरकार से अतिक्रमण हटाने की उच्च न्यायालय के आदेश के खिलाफ दायर याचिकाओं पर जवाब भी मांगा और मामले की अगली सुनवाई 7 फरवरी को होगी।

पीठ ने कहा मामले में भूमि की प्रकृति भूमि के स्वामित्व और उससे जुड़े अधिकारों से संबंधित कई कोण है हम आपसे कहना चाहते हैं कि कुछ हल निकालिए यह मानवीय मुद्दा है उच्च न्यायालय का आदेश सही नहीं है कि अर्धसैनिक बलों का प्रयोग कर उन्हें निकाला जाए ।हमारा मानना है कि लोगों को हटाने के लिए एक व्यवहारिक व्यवस्था जरूरी है।

उच्चतम न्यायालय के आदेश के बाद कई हजार लोगों का आशियाना शायद अब बच जाए लेकिन इस आदेश के कई मायने हैं इस आदेश के बाद उच्चतम न्यायालय के प्रति जनता का भरोसा बढ़ेगा इसमें कोई दो राय नहीं है ।और दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि यह आदेश ऐसे समय में आया है जब लोग आन्दोलन कर रहे हैं अपने घरों को बचाने के लिए महिलाएं, बुजुर्ग, बच्चे सब अपने अपने घर को बचाने के लिए सड़कों में बैठे थे ऐसे में इस निर्णय के बाद यहां रह रहे लोगों को सुकून मिला होगा। क्योंकि आम इंसान का घर ही उसकी दुनिया होती है वो उसके लिए एक घर से बढ़कर उसकी यादों का एक पिटारा होता है जहां उसके बाप दादा और परदादा की स्मृतियां संजो कर रखी जाती है जहां उसके बेटे की और यहां तक कि उसके पोते की स्मृतियों के लिए जगह खाली रखी जाती है ऐसे में अगर वह घर टूटने की कगार में होता है तो आम इंसान सड़क पर खुद-ब-खुद आ ही जाता है और मजबूर हो जाता है आन्दोलन को।

फिलहाल इस निर्णय ने यह साबित कर दिया है कि आज भी भारत में ऐसे न्यायधीश है जो कुछ निर्णय मानवीय दृष्टिकोण को ध्यान में रखकर देते हैं साथ ही इस निर्णय ने एक बहुत बड़ी आबादी को और उनके आशियाने को ना केवल उजड़ने से बचा लिया है बल्कि एक बड़े जन समूह का न्यायपालिका के प्रति विश्वास को और अधिक मजबूत करने में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

देवेंद्र प्रसाद एडिटर इन चीफ, मुद्दा टीवी ख़बर।

- Advertisement -spot_img

More articles

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

- Advertisement -spot_img

Latest article