कहते हैं सपनों की उड़ान के लिए पंखों की नहीं ज़ज्बे और कुछ कर गुजरने की आग ज़रूरी होती है। जिनके अंदर ये आग होती है वो पहाड़ का सीना चीरकर एक एसी कहानी लिख देता हैं जो औरों के लिए एक मिशाल बन जाती है। ऐसी ही एक कहानी है उत्तर प्रदेश के छोटे से गाँव बरनावे में रहने वाली नैंसी त्यागी की जिन्होंने अपने पिताजी को सपोर्ट किया और घर की जिम्मेदारी उठाने का जिम्मा लिया।नैंसी के माता पिता ने अपने बच्चों को पालने के लिए बहुत अधिक परिश्रम किया और अपने बच्चों को स्कूल में पढ़ाया और उन्हें अच्छी परवरिश दी।मगर सिर्फ ये जिंदगी को आगे बढ़ाने के लिए काफी नहीं था तब नैंसी ने दिल्ली जाने का फैसला किया और UPSC की तैयारी करने के लिए मन बना लिया था । साथ ही अपना खर्चा चलाने के लिए नैंसी ने सिलाई शुरू करी और बॉलीवुड दीवाज़ की ड्रेसेस को रिकिरयेट कर सोशल मीडिया के माध्यम से अपने इस हिडन टैलेंट को सबको दिखाया और उनके इस टैलेंट को सभी से बहुत सरहाना भी मिलने लगी इन सब चीजों से नैंसी का आत्मविश्वास और भी बढ़ गया।
नैंसी निरंतर परिश्रम करते रही और फिर वो सपना सच हुआ जो उन्होंने कभी सोचा भी था नैंसी को कान फिल्म फेस्टिवल से बुलावा या गया और रातों रात नैंसी चर्चा का केन्द्र बन गई। नैंसी त्यागी की यह कहानी उसी मेहनत और संघर्ष का परिणाम है, जिसने उन्हें कान फिल्म फेस्टिवल पहुंचने की सौगात दी और कान जैसे महत्वपूर्ण प्लेटफ़ॉर्म पर अपने विचारों को पेश करने का मौका दिया।नैंसी ने कान में पहनी ड्रेस खुद ही बनाई जिसे तैयार करने में 1000 मीटर कपड़ा और महीने का समय और मेहनत लगी मगर जब उन्होने इस ड्रेस को पहना और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर खुद का प्रतिनिधित्व किया और बड़े पैमाने पर लोगों ने उनको पसंद किया और उनकी सरहाना की।यह एक सपने का सच होने की यात्रा थी, जो उन्होंने अपने कलाकारी और संघर्ष से निभायी ।
इस तरह, नैंसी त्यागी का कान फ़िल्म फ़ेस्टिवल में पहुंचना उनकी निरंतर मेहनत, विश्वास और संघर्ष का परिणाम है। उनकी कहानी हमें यह सिखाती है कि सपने साकार करने के लिए केवल मेहनत और विश्वास ही काफी नहीं होता बल्कि संघर्षों से भरपूर रास्ते पर भी संयम नहीं खोना चाहिए और आगे बढ़ते रहना चाहिए।
तुलसी त्यागी। मुद्दा टीवी