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उत्तराखंड का भोजन क्यों है ख़ास, शेफ देवाशीष पांडे

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जब कभी शुद्ध, स्वच्छ, पौष्टिक आहार की बात होती है तो उत्तराखंड के खाने की बात जरूर होती है। यहां का खाना हर किसी उत्तराखण्डियों की आत्मा से जुड़ा है , चाहे वे देश में रहे या विदेश में पहाड़ी खाना खाए बिना उनका दिन ढलता नही है । उत्तराखंड जितना अपना संस्कृति के लिए जाना जाता है उतना ही उसका खाना भी प्रचलित है। अगर में उत्तराखंड के खाने को चंद शब्दो मे बयान करु तो में इसे “स्वर्ग के व्यंजन” कहूंगा।
हालाकि बदलते समय और भाग दौड़ की जिंदगी में फास्ट फूड हर गलियों में दिखता है लेकिन जब आम पहाड़ी के रोजाना दिनचर्या की बात करे तो पहाड़ी हर दिन अपने राज्य के खाने से सुबह की शुरुआत करता है और रात्रि तक उसकी महक और जायके में दिन व्यतीत करता है ।
उत्तराखंड में पारंपरिक भोजन तांबे के बर्तनों में बनाया जाता था जिसे बाद में लोहे के कुछ बरतनों में भी बनाया गया और अब जब हम आधुनिक युग में है तो हर किस्म के बर्तनों को इस्तेमाल में लाया जाता है ।हालाकि उत्तराखंड का खाना इसके क्षेत्रों के हिसाब से बटा है लेकिन कुछ व्यंजन दोनो क्षेत्रों में एक समान बनाए जाते है।
जब आज के समय लोग फाइबर से भरपूर खाने को अपने भोजन में शामिल करने में लगे है वही उत्तराखंड के दोनो क्षेत्रों में मडुवा लोगो की पसंद है जिसे आजकल अलग अलग तरीके से व्यंजनों में डाला जाता है ,उदाहरण के लिए मडूवे के मोमोज या कुकीज़। झिंगोरे की खीर के बिना उत्तराखंड के भोजन को समाप्त करना उसका अपमान हो सकता है इसलिए खीर में चावल के अलावा उत्तराखंड के पास झिंगोरा ( Indian Barnyard millet) है।
जब मीठे की बात हो ही रही है तो आप सभी बाल मिठाई से परिचित तो होंगे ही जिसमे मावा के चॉकलेट के ऊपर चीनी के सफेद दाने है ,जिसे आज भी हमारे पहाड़ी लोग पहाड़ से अपने साथ कुछ डब्बे शहर ले जाते है और लोगो के साथ बांट कर खाते है।
लेख – शेफ देवाशीष पाण्डेय

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