अमावस्या क्या है और कब आता है ?
कृष्णपक्ष की अंतिम तिथि जिसकी रात में चंद्रमा की एक भी कला दिखाई नहीं देती। अमावस्या हिन्दु पंचांग के अनुसार माह की 30 वीं है, चंद्रमा दिखाई नहीं देता, रात्रि में सर्वत्र गहन अन्धकार छाया रहता है ।
अमावस्या प्रत्येक माह ही आती है पर इस वर्ष २२ अगस्त को है कुशोत्पाटिनी अमावस्या।
इस अमावस्या का महत्व बहुत ही अधिक है आईये जानेंगे कैसे और क्या करे इस अमावस में।
हिन्दुओ के धार्मिक क्रिया कलापो में कुशा का बहुत महत्व है और कई पूजा में इसका होना भी अनिवार्य है।
पूजाकाले सर्वदेवे कुशहस्तो भवेच्छुचि:
कुशेन रहिता पूजा विफला कथिता मया ||
अर्थात पूजा करती समय हर देवता की पूजा सामग्री में कुशा जरुरी है , कुशा की बिना की गई पूजा विफल मानी जाती है।
भाद्रपद मास की अमावस्या तिथि को कुशग्रहणी अमावस्या कहते हैं। धर्म ग्रंथों में इसे कुशोत्पाटिनी अमावस्या भी कहा गया है। कुशग्रहणी अमावस्या के दिन वर्ष भर किए जाने वाले धार्मिक कामों तथा श्राद्ध आदि कामों के लिए कुश एकत्रित किया जाता है। वैसे तो शास्त्रों में दस प्रकार के कुशा का वर्णन आता है परन्तु ये महत्वा पूर्ण है की भाद्रपद मास की अमावस्या तिथि में जो भी कुशा मिल जाये उसे ले लेना चाहिए।
आम धारणा है की कुशा का प्रयोग श्राद्ध में या फिर ग्रहण के दौरान घर में मौजूद खाने-पीने की चीजों में डालने के लिए किया जाता है। ग्रहण के दौरान खाने-पीने की चीजों में कुशा डालने से ग्रहण की अशुभ किरणों से खाद्य पदार्थ को बचाया जाता है। परन्तु देवता और पितरो पर चढाने के कुशा में भेद है।
कोनसी कुशा देव को चढ़ा सकते है और कोनसी पितरो को –
जिस कुशा का मूल सुतीक्षण हो, जिसमे पत्ति हो, जिसका आगरा भाग कटा हुआ न हो और हरी हो , वो देव तथा पितृ दोनों कार्यो में उपर्युक्त होती है।
कुशा के फायदे –
पूजा या अनुष्ठान करते समय कुशा के आसान पर बैठना से शरीर में शक्ति का संचार होता है।
कुशा के आसन पर पूजा और अनुष्ठान लाभकारी बताया गया है। ऐसा करने से दौरान शरीर में आनी वाली सकारात्मक ऊर्जा धरती में नहीं जाती है ।
टिप्स
घर में कुशा रखने से घर का वातावरण शुद्ध रहता है और नकारात्मक ऊर्जा अशुभ प्रभाव नहीं डालती है। साथ ही घर में अपवित्र दोषों के संक्रमण को रोकती है।
सेलिब्रिटी वास्तुशास्त्री डॉ सुमित्रा अग्रवाल,कोलकाता