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पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत का अनुरोध, बस करो अब

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एक पूर्व सांसद का अनुरोध, एक हिंदी के प्रति समर्पित सामाजिक कार्यकर्ता का अनुरोध, बस करो श्री अधीर रंजन प्रकरण को यहीं समाप्त माना जाय, वो क्षमा मांग चुके हैं और प्रारंभ से ही वो अपनी बात क्षमाभाव के साथ ही कह रहे हैं। भारतीय राजनीति इतनी तंगदिल नहीं होनी चाहिये कि उसे महामहिम के लिए अनायास निकले एक शब्द के लिए अपने साथी द्वारा महामहिम के सम्मान के प्रति मांगी गई क्षमा को स्वीकार न किया जाय और यदि तंगदिल बनेंगे तो जिस तरीके से भाजपा सांसदों ने घेर कर सोनिया जी को धमकाने का प्रयास किया है, क्या वह निंदनीय नहीं है? क्या यह निंदनीय नहीं है कि गलती हो श्री अधीर रंजन जी के मुंह से और उसमें घसीटा जाए श्रीमती सोनिया गांधी जी को? एक हिंदी प्रेमी पूर्व सांसद के तौर पर मैं, भाजपा के दोस्तों से कहना चाहता हूं कि इस अधीर रंजन प्रकरण को उठाकर आपने विशेष तौर पर दक्षिण के अहिंदी भाषी भाइयों को हिंदी में वार्तालाप करने, हिंदी को अपने भाषण के और अपनी बातचीत की भाषा बनाने या हिंदी को साहित्य के तौर पर सीखने से सिर्फ हतोत्साहित किया है। भाजपा के दोस्तों को एक छोटा प्रकरण जब सौभाग्य से मैं, श्री अटल बिहारी वाजपेई जी के साथ राजभाषा समिति की दूसरी उप समिति का सदस्य था। उनकी पहल पर एक अहिंदी भाषी तोम्बी सिंह जी को हमारे समिति का संयोजक बनाया गया था और उसमें जो अहिंदी भाषी सदस्य/सांसद थे, उनमें दक्षिण के सांसद भी थे। अटल जी हमेशा उनको अधिकारियों से हिंदी में टूटी-फूटी हिंदी सही उसमें प्रश्न पूछने के लिए प्रोत्साहित करते थे। एक बार मेरे प्रश्न पूछने के बाद अटल जी की प्रश्न पूछने की बारी आई तो अटल जी ने मेरे प्रश्न पूछने के अंदाज की प्रशंसा करते हुए कहा कि हरीश रावत जी ने बहुत चुटीले अंदाज में प्रश्न पूछे और उन्होंने चुटीले अंदाज को दो बार दोहराया, वो मुझे भी प्रोत्साहित करना चाहते थे। जब अटल जी के बाद हमारे एक दक्षिण भारतीय सांसद की बारी आई, अधिकारियों से प्रश्न पूछने की तो उन्होंने कहा कि बाजपेई जी व रावत जी ने चुति… आगे के शब्द को वो कुछ गड़बड़ा गए जिस शब्द का अर्थ बड़ा हास्यास्पद होता है और हम सब जोर से हंसे और अटल जी ने मेज थपथपा कर उनके बोलने के अंदाज को प्रोत्साहित किया। जबकि जो शब्द उन्होंने उच्चारित किया था वह एक प्रकार से गाली है और यही गलती वह मातृभाषा शब्द के उच्चारण में भी कर गए। मगर सबने उनके प्रयास की सराहना की। जबकि वह व्यक्ति कहीं दूर-दूर से भी अटल जी के पार्टी के नहीं थे। हमें हिंदी को यदि राष्ट्रभाषा बनाना है तो राजनीति की तंगदिली से आगे बढ़कर सोचना पड़ेगा। फिर नारी का तो हर स्वरूप वंदनीय है। हम उसको प्रणाम करते हैं। वह पूज्यनीय है, कन्या के रूप में, बेटी के रूप में, पत्नी के रूप में, मां के रूप में, किस रूप में मां, वंदनीय नहीं है। हमारी महामहिम राष्ट्रपति हर रूप में वंदनीय हैं, कोई भी व्यक्ति कभी ऐसा महापाप नहीं कर सकता कि जिससे यह लगे वह उनका अपमान कर रहा है और मैं जानता हूं यदि प्रधानमंत्री जी ने एक स्पिन बॉल के बजाय स्टेट बोल डाली होती और विपक्ष से पहले कहा होता कि इस बार क्यों नहीं हम एक आदिवासी महिला को देश के सर्वोच्च पद पर बैठाएं तो द्रोपति मुर्मू जी तो सर्वसम्मति से देश की राष्ट्रपति बनी होती और आज वह हमारी राष्ट्रपति हैं। हम सब उनके हर उस रूप को उनके मां स्वरूप को भी, उनके पत्नी स्वरूप को भी, उनकी बेटी स्वरूप को भी, उनके एक संघर्षशील महिला स्वरूप को भी और उनके आदिवासी स्वरूप को भी बार-बार नमन करते हैं, प्रणाम करते हैं। मगर भाजपा के दोस्तों को मैं कहना चाहता हूं, राजनीति के लोभ में छोटापन न दिखाइए, आपका यह छोटापन अब ओछा भी लग रहा है।

पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत,( फेसबुक वॉल )

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